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फेसबुक फ्रेंड (लघुकथा)

ऑनलाईन प्रेम
फ़ेसबुक फ्रेंड
लेखिका – ©® स्वाती बालूरकर, सखी

“ये मुझे मैसेज क्यों नहीं कर रही? मुझे ऐसे कैसे भूल गई? आखिर हुआ क्या है इसे?”

शुभंकर झुंझलाते हुए बुदबुदा रहा था।

आज भी वह फेसबुक मैसेंजर पर उसके मैसेज का इंतज़ार कर रहा था। थोड़ी-थोड़ी देर में फेसबुक खोलता, कुछ न कुछ स्क्रॉल करता, फिर दोबारा चेक करता। लेकिन न जाने क्यों हर बार निराशा ही हाथ लगती।
पिछले तीन दिनों से उसका एक भी मैसेज नहीं आया था। ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। इसके अलावा दोनों के बीच संपर्क का कोई और ज़रिया भी नहीं था। आखिर हुआ क्या होगा? उससे संपर्क कैसे करे?
अब उसे चिंता होने लगी थी।

सब ठीक तो है न—इसी सोच में वह डूबा था, क्योंकि उसे आदत पड़ चुकी थी। उसके “गुड मॉर्निंग” के बिना शुभंकर का दिन शुरू नहीं होता था और “गुड नाइट” के बिना दिन खत्म नहीं होता था।

उसे हर समय ऐसा लगता था मानो वह उसके साथ ही हो—

इतना अधिक जुडाव कि दिनभर उनकी चैट चलती रहती थी।

यह एक वर्चुअल फ्रेंडशिप थी, लेकिन कुछ अलग ही थी—साथ न होते हुए भी साथ होने का एहसास। इसलिए उसका मैसेज न आना उसके लिए चिंता का कारण बन गया था।

डेढ़ साल पहले फेसबुक पर उनकी दोस्ती हुई थी। मैसेंजर पर बातचीत बढ़ती गई और दोस्ती गहरी होती गई। फिर दोनों को यह अच्छा लगने लगा। विचार मिले, पसंद-नापसंद भी मिलती गई।

शुरुआत के दिनों में दोनों ने तय किया था कि वे एक-दूसरे का फोन नंबर नहीं लेंगे, फोन पर बात नहीं करेंगे और कभी मिलेंगे भी नहीं—फिर भी दोस्ती निभाएंगे। कभी मिलना नहीं, साथ रहना नहीं—इसलिए दोनों बेझिझक बातें करते थे।
इस वजह से वे एक-दूसरे को जज नहीं करते थे। दिल की हर बात कहने का एकमात्र ज़रिया था—फेसबुक मैसेंजर।

धीरे-धीरे एहसास होने लगा कि दोनों का स्वभाव कितना एक जैसा है—एक ही सोच। इसलिए कुछ भी समझाने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी, तुरंत कनेक्शन बन जाता था।
दोस्ती के बाद से उनकी बातें ही अलग थीं—बस खुशी देने वाली!

उन्होंने कभी एक-दूसरे की निजी ज़िंदगी में ज़्यादा दखल नहीं दी। वह उसकी पोस्ट्स पर दिल खोलकर लिखती थी, लेकिन खुद कभी कोई पोस्ट नहीं डालती थी। इसलिए उसे उसके बारे में कुछ कहने या कमेंट करने का मौका ही नहीं मिलता था।
चैट करते समय वह सोच-समझकर, धीरे-धीरे टाइप करती थी, इसलिए कभी-कभी उसे समय लगता था। शुभंकर की टाइपिंग तेज़ थी, इसलिए वह उसके जवाब का इंतज़ार करता रह जाता था।
तीन दिनों से वह उसे बहुत मिस कर रहा था। पुराने दिनों को याद कर रहा था, पुराने मैसेज पढ़ रहा था।
सच में, उसने उसे कितना आनंद दिया था!

न देखे, न मिले—फिर भी उसके लिए एक गहरी खिंचाव थी।
आज उसने उसका प्रोफाइल पिक बार-बार देखा—ब्लैक एंड व्हाइट फोटो। फोटो देखकर वह उसे “एंजल” कहता था। खुद से मुस्कुरा उठा।

उसी फोटो को डीपी रखने पर उसने ज़ोर दिया था।
उसने सिर्फ एक बार प्रोफाइल पिक बदला था, लेकिन उसने फिर वही रखने को कहा था।

पहला दिन यूँ ही सूखा बीता। दूसरे दिन उसने खुद दो-चार मैसेज भेजे, पर जवाब नहीं आया। आज तीसरे दिन वह बेहद बेचैन हो गया।
अब वह सचमुच बहुत चिंतित था। सोच में डूबा—फिर होश में आया।
“अरे एंजल, कहाँ गायब हो गई हो? क्या हुआ? इस दुनिया में हो न? जिंदा तो हो? ”
गुस्से में पहली बार उसने ऐसा मैसेज भेजा कि शायद अब जवाब आए।

“उसके लिए यह दोस्ती होगी… लेकिन मैं उससे प्यार करता हूँ, यह कैसे बताऊँ?” वह खुद से बुदबुदाया।

आधे घंटे बाद अचानक मैसेज आया—
“हाँ, फिलहाल तो इस दुनिया में हूँ। चाहो तो आकर देख लो! प्लीज़ मुझसे मिलने आओ। इसे आख़िरी मुलाक़ात ही समझो!”
इतने टेंशन में भी वह ज़ोर से हँस पड़ा।

‘कमाल की दोस्त मिली है! मैंने पूछा दुनिया में हो न, और ये आख़िरी मुलाक़ात कह रही है!’
वह खुद से बोला।

“लेकिन हमारा नियम? वो टूट जाएगा न, एंजल?” उसने मैसेज किया।
“हमने ही बनाया है, हम ही तोड़ सकते हैं। इसमें इतना क्या?”
उसका तुरंत जवाब आया।

“ओके, मुझे मंज़ूर है। लेकिन कहाँ मिलेंगे? तुम कहाँ रहती हो?”
“मैं… अभी तुम्हारे ही शहर में आई हूँ।”

“दॅट्स ग्रेट! इतनी शरारती हो, अब बता रही हो? एंजल, तय तो हुआ था न कि नहीं मिलेंगे। अब मैसेज किया है तो आ ही रहा हूँ—फिर लड़ना मत! आज आऊँ या कल?”

“अरे अभी निकलो, अभी! पहली और आख़िरी मुलाक़ात है—जल्दी आओ, मैं इंतज़ार कर रही हूँ!”

उसका यह मैसेज पढ़ते ही वह खुशी से भर गया। शरीर में अचानक ऊर्जा दौड़ गई।

उसे कितना पसंद करती है—यह चैट में कैसे बताए? आज लगा, सामने मिल ही रहे हैं, तो कहने में क्या हर्ज़ है। वह क्या कहेगी? ज़्यादा से ज़्यादा ‘ना’ ही कहेगी—कोई फर्क नहीं पड़ता!

वह जल्दी से तैयार हुआ। अपने पसंदीदा कपड़े पहने, चंपा का रखा हुआ इत्र लगाया। जाते वक्त सुंदर लाल गुलाब और रजनीगंधा का गुलदस्ता लेना नहीं भूला।

सोचा—और क्या गिफ्ट दे? उसके बारे में कोई निजी जानकारी तो है नहीं। लेकिन फूल उसे पसंद हैं—इतना तो पता है।
उसका मैसेज बार-बार पढ़ता जा रहा था, मन में गुदगुदी हो रही थी।
मैसेज टोन बजी—लोकेशन और पता आया।
पता पास ही था। वह निकल पड़ा।
हाँ, सही है—उस इलाके में “रोज़ केयर मल्टीस्पेशलिटी हॉस्पिटल” था। उसी के पास की अपार्टमेंट!
वह जल्दी पहुँच गया।

दिल की धड़कन बडी तेज, कुछ अलग ही थी।

यह अनुभव अलग था—क्योंकि रोज़ की प्रेमिका से मिलना अलग बात है, और यह तो कभी न देखी, न मिली प्रेमिका थी!
वह कैसी होगी? कैसे बोलेगी? कैसी दिखेगी?
एक मीठी सी झनझनाहट!
उसे देखकर वह कैसी प्रतिक्रिया देगा—समझ नहीं पा रहा था।
उसने गाड़ी पार्क की, लिफ्ट में पाँचवीं मंज़िल का बटन दबाया। फ्लैट नंबर 501—बेल बजाई।

अगले ही पल एक सुंदर युवती ने दरवाज़ा खोला। ट्रैक पैंट और टी-शर्ट, बालों का सादा-सा जूड़ा—सरल, लेकिन बेहद सुंदर! शुभंकर बडा खुश हुआ!
लेकिन उसका चेहरा प्रोफाइल पिक से बिल्कुल मेल नहीं खाता था। अपेक्षा भंग होना स्वाभाविक था। उसने दरवाज़े पर ही पूछा—

“एंजल? आई मीन… तिलोत्तमा?”

वह हँसते हुए बोली—“प्लीज़ कम इन। शुभंकर, राइट?”
उसने हाँ में सिर हिलाया।

“प्लीज़ अंदर आइए, जिनसे मिलने आए हैं, आपकी एंजल अंदर है।”

वह एक पल हॉल में ठिठक गया।
टेबल पर एंजल का वही ब्लैक एंड व्हाइट फोटो रखा था—जो प्रोफाइल पर था।

वह उसके पीछे बेडरूम में गया और कुर्सी पर बैठ गया।
वह पानी लाने किचन में गई। सामने बेड पर एक बुज़ुर्ग महिला लेटी थी—उसे एकटक देख रही थी। कितना तेजस्वी चेहरा!
युवती पानी का गिलास लेकर आई। शुभंकर ने गिलास हाथ में लिया ही था कि आवाज़ आई—
“आ गए शुभंकर? माफ़ करना रे… इस जन्म में बस इतना ही साथ था। अगले जन्म में ऐसा नहीं करूँगी। तुम्हें देख लिया, अब मैं मरने के लिए मुक्त हूँ।”

शुभंकर का हाथ काँप गया। गिलास गिर पड़ा, कमरे में पानी फैल गया।

अविश्वसनीय!
वह बुज़ुर्ग महिला—यानी उस युवती की दादी!

वह तुरंत उनके पास गया—
“आप? आप कौन हैं? तिलोत्तमा…?”

“हाँ, मैं ही तुम्हारी एंजल!”

नातिन शायद पोछा लाने गई थी। एंजल की आँखों से आँसू बह रहे थे।
शुभंकर को ज़बरदस्त झटका लगा। वह कुछ समझ नहीं पा रहा था। मन में द्वंद्व था—ठगे जाने का एहसास, फिर भी गुस्सा नहीं।
किसी ऋणानुबंध के बिना क्या ऐसे रिश्ते बनते हैं?
वह क्या पूछे, नौकरी, उम्र, यह छल—कुछ समझ नहीं आ रहा था।
एंजल ने उसका हाथ कसकर पकड़ लिया। जाने कैसा खिंचाव था —उसने उसे उठाकर बैठाया।
नातिन वापस आई।
एंजल ने हाथ जोड़कर कहा—
“सॉरी शुभंकर… सॉरी डियर!”
और अचानक उसके कंधे पर निष्प्राण हो गई।
“ग्रैनी!” नातिन चिल्लाई।
और फिर—सन्नाटा।
नातिन रो रही थी। शुभंकर की आँखों से आँसू रुक नहीं रहे थे। उसका हाथ थामे, कंधे पर निष्प्राण सिर!
शुभंकर घर लौटा—जैसे किसी ने उसके प्राण ही निकाल लिए हों।
तेरहवीं का संदेश मिलने पर भी वह नहीं गया।
पंद्रहवें दिन नातिन का मैसेज आया—
“एक बार मिलकर जाइए, मैं शहर छोड़ रही हूँ।”
वह गया।
हॉल में चुपचाप बैठा। सारा सामान पैक था।

“शुभंकर सर, मैं तिलोत्तमा हूँ। वह मेरी दादी थीं— मंजुला। मैंने ही उन्हें स्मार्टफोन और फेसबुक सिखाया था। हम दोनों ही साथ रहते थे। नौकरी के अच्छे मौके के कारण मुझे लंदन जाना पड़ा। जाते समय अपना पुराना फोन उन्हें दे दिया। ज़्यादातर ऐप्स डिलीट कर दिए थे, बस संपर्क के लिए रखा था। पर मुझे नहीं लगा था कि वे मेरा फेसबुक अकाउंट इस्तेमाल करेंगी।”

“ओह माय गॉड! यानी वह आपका अकाउंट था! लेकिन उन्होंने ऐसा क्यों किया होगा?”

“क्या कहूँ… प्रेम की भूखी थीं। उनकी बीस साल की उम्र में नाना चले गए। संघर्ष भरी ज़िंदगी। अब कैंसर—तीसरा स्टेज था।
आपसे मिलने की चाह में हम इस शहर आए, अस्पताल के पास घर लिया। आपने उन्हें बहुत प्यार और खुशी दी। धन्यवाद!”

उसने हाथ जोड़ लिए। वह निःशब्द था।

“फोन न करने, न मिलने के सारे नियम उन्होंने ही बनाए थे। मैं बस हाँ कहता रहा। इसलिए वे धीरे टाइप करती थीं।”
वह यादें सुनाता गया।

“सत्तर साल की महिला का फेसबुक पर होना? मैसेजिंग—अविश्वसनीय! मेरे मन में तो वे हमेशा न देखी एंजल ही रहेंगी। रिश्ता तो दोस्ती से शुरू हुआ था, पर भावनात्मक रूप से मैं बहुत जुड़ गया था।”
उसकी आँखें भर आईं।

“मेरी ग्रैनी कितनी रोमांटिक थीं… मुझे भी टिप्स देती थीं।”
तिलोत्तमा भी रो पड़ी।

“आप उनके…?”

“मैं उनकी नातिन हूँ—बेटी की बेटी। वे कहती थीं, प्यार की कोई उम्र नहीं होती। आपके कारण उन्होंने अपना आख़िरी समय खूबसूरती से जिया। और आपकी तरह करीबी दोस्त के कंधे पर उन्होंने प्राण छोड़े—है न?”

उसके पास कहने को कुछ नहीं था।

शुभंकर ने एंजल की तस्वीर को श्रद्धा से प्रणाम किया और लौट गया—शायद अगले जन्म की आशा में!